<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-13432155</id><updated>2012-01-13T23:45:09.628-08:00</updated><category term='सर्ग -  दो'/><title type='text'>शहीद भगत सिंह</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>डा० व्योम</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://4.bp.blogspot.com/-HNGbFMXWTg0/ToqUw90EvLI/AAAAAAAAA_4/6Fw96pM3674/s220/vyom.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>4</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-13432155.post-6306337987693515720</id><published>2008-02-05T09:19:00.001-08:00</published><updated>2011-09-15T18:25:22.469-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सर्ग -  दो'/><title type='text'>सर्ग दो</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;देवकी का नन्दन यशोदा की गोद में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``बात क्या मन की कहूँ मैं, आज जब तुम जा रहे हो,&lt;br /&gt;धैर्य मैं धारण करूँ, यह बात तुम समझा रहे हो।&lt;br /&gt;धैर्य का उपदेश यह जो आज मुझको दे रहे हो,&lt;br /&gt;क्या न समझूँ, तुम परीक्षा आज मेरी ले रहे हो।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``यह परीक्षा भी नहीं, उपदेश क्या देना मुझे है?&lt;br /&gt;नाव जीवन की तुम्हारे, साथ ही देना मुझे है।&lt;br /&gt;जा रहा हूँ, किन्तु यह तो एक स्वल्प प्रवास ही है,&lt;br /&gt;यह हमारे कार्यक्रम का एक प्रिय अभ्यास है है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``कार्यक्रम? क्या कार्यक्रम फिर तुम वही दुहरा रहे हो?&lt;br /&gt;क्या वहीं विध्वंस-लीला फिर मचाने जा रहे हो?&lt;br /&gt;इस हुकूमत को उलटना, यह तुम्ह़ारा कार्यक्रम है,&lt;br /&gt;काम शुभ करने चले, साहस तुम्हारा कुछ न कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;किन्तु &lt;/span&gt;घर का भार किस पर छोड़ने का तय किया है?&lt;br /&gt;क्या कभी इस और भी तुमने कभी निश्चय किया है?&lt;br /&gt;हैं न कम भाई तुम्हारे, जेल को ही घर बनाया,&lt;br /&gt;भाव मन में भी तुम्हारे, यह सदा से ही समाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहू कितनी दुखी, क्या तुम नहीं ये जानते हो?&lt;br /&gt;क्यों न मन की पीर उसकी तुम कभी पहचानते हो?&lt;br /&gt;जेल को घर समझ, देवर ने किया घर से किनारा,&lt;br /&gt;रह गया है आँसुओं का ही इसे केवल सहारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्य-क्रम ही लक्ष्य है, तो यत्न कर उसको छुड़ाओ,&lt;br /&gt;दुख नहीं होगा मुझे, वह घर रहे तुम दूर जाओ।&lt;br /&gt;क्यों न दुख-सुख भी परस्पर बाँट सम-भागी बनें हम?&lt;br /&gt;वीतरागी तो नहीं, फिर क्यों न अनुरागी बनें हम?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक ही तुम कह रहे हो, यत्न का भी ध्यान मुझको,&lt;br /&gt;वीर भाई पर सदा से ही रहा अभिमान मुझको।&lt;br /&gt;और सचमुच दुख वधू का भी दुसह अब हो चला है,&lt;br /&gt;किन्तु रो-धो कर किसी का आज तक कब दुख टला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दु:ख कितना भी बड़ा हो, धैर्य ही उपचार होता,&lt;br /&gt;डूबते को एक तिनका भी बड़ा आधार होता।&lt;br /&gt;सौंप दो उसको भगत, खेले उसी की गोद में वह,&lt;br /&gt;पुत्र अपना ही समझ कर, हो सदा ही मोद में वह।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गृह-चिन्तन सभी, अब यह तुम्हारा कार्य होगा,&lt;br /&gt;मैं रहूँ निश्चिन्त, तो फिर यत्न भी अनिवार्य होगा।&lt;br /&gt;आज से सहयोग या सह-धर्म यह होगा तुम़्हारा,&lt;br /&gt;यह तुम्हारा योग, मेरे यत्न में होगा सहारा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;है मुझे विश्वास, अपन धर्म तुम पहचानती हो,&lt;br /&gt;जो परिस्थितियाँ हमारी है, वह तुम जानती हो।&lt;br /&gt;हैं सदा चलना उसी पर, पंथ जो अपना लिया है,&lt;br /&gt;उठ गयें जो पाँव, काँटों जो समझौता किया है''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह गृह-पति गये, था कार्य का उनको निमंत्रण,&lt;br /&gt;और गृहणी को दिया कर्त्तव्य अब गृह का निमंत्रण,&lt;br /&gt;स्नेह से निज देवरानी को बहन कहकर बुलाया,&lt;br /&gt;और फिर मंतव्य अपना यत्न से उसको सुनाया-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``जानती हो बहन! तुमसे है छिपी क्या बात घर की&lt;br /&gt;खा रहे यह ठोकरें सब, देश के हित दर-बदर की,&lt;br /&gt;छोड़कर दायित्व मुझ पर- आज वह भी वह जा चुके हैं,&lt;br /&gt;किस तरह करना हमें क्या, वे सभी समझा जा चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भार मैं गृह की व्यवस्था का स्वयं ही ले रही हूँ।&lt;br /&gt;जानती हूँ बाल के प्रति हैं अकथ अपनत्व तुमको,&lt;br /&gt;लाल के प्रति आज माँ का सौंपती हूँ स्वत्व तुमको''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``भाग्यशाली मैं बहुत, जीजी! तुम्हारा प्यार पाकर,&lt;br /&gt;और भी बड़भागिनी हूँ, आज यह अधिकार पाकर।&lt;br /&gt;यह बड़प्पन है तुम्हारा, जानतीं तुम मर्म मेरा,&lt;br /&gt;चाहती हूँ, पर सुरक्षित रहे सेवा-धर्म मेरा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्नेह तो पा ही लिया है, किन्तु मैं आशीष पाऊँ,&lt;br /&gt;कर्म-रत रहकर सदा सद्धर्म में अपना निभाऊँ।&lt;br /&gt;चैन पहुँचाती सभी के हृदय को कर्त्तव्य-रति है;&lt;br /&gt;कर्म की ही प्रेरणा, इस विश्व-जीवन की सुगति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओर यह चन्दा सलोना जो मुझे तुमने दिया है,&lt;br /&gt;सच कहूँ जीजी! बड़ा उपकार ही तमुने किया है।&lt;br /&gt;लग रहा मुझको कि जैसे आज बचपन लौट आया,&lt;br /&gt;कूदता-हँसता खिलौना, खेलने को आज पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाल  में चापल्य, वय के साथ बढ़ता जा रहा हूँ,&lt;br /&gt;बाल-रवि वय के गगन में पुलक चढ़ता जा रहा है।&lt;br /&gt;ठुमक कर चलना, फुदकना, सरलता से खिल-खिलाना,&lt;br /&gt;मोहनी सी डालता है, बाल का आँखें मिलाना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये नयन बोले बिना ही भेद मन का खोल देते,&lt;br /&gt;और अस्फुट बोले तो मानो सुधा-रस घोल देते।&lt;br /&gt;गोद का, घर का, न आँगन का इसे बन्धन सुहाता,&lt;br /&gt;लग गयें हैं, पाँव बाहर खेलने जी छटपटाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है मुझे विश्वास जीजी! वंश का दीपक हमारा,&lt;br /&gt;विश्व का आलोक होगा, देश का उज्ज्वल सितारा।&lt;br /&gt;भग्न इस मेरे हृदय की, एक शुभ आशा यह ही हंै,&lt;br /&gt;देश का गौरव बने यह, आज अभिलाषा यहीं है।&lt;br /&gt;-०००-&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13432155-6306337987693515720?l=bhagatsinghmahakavya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/feeds/6306337987693515720/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=13432155&amp;postID=6306337987693515720' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/6306337987693515720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/6306337987693515720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/2008/02/blog-post_3532.html' title='सर्ग दो'/><author><name>डा० व्योम</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://4.bp.blogspot.com/-HNGbFMXWTg0/ToqUw90EvLI/AAAAAAAAA_4/6Fw96pM3674/s220/vyom.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-13432155.post-6740439061110394287</id><published>2008-02-05T06:56:00.000-08:00</published><updated>2008-02-05T06:58:24.216-08:00</updated><title type='text'>बुढ़िया-पुराण या परीक्षित मनोविज्ञान</title><content type='html'>बुढ़िया-पुराण या परीक्षित मनोविज्ञान&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शैशव सुख की साँस ले रहा था ममता की मृदु छाया में,&lt;br /&gt;रमे हुए थे सब ही के मन, उस जादूगर की माया में।&lt;br /&gt;जाने कौन-कौन सी निधियाँ, मुट्ठी में बाँधे रहता था,&lt;br /&gt;सुखद सिद्धियाँ कितनी-कितनी, मन ही मन साधे रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कुछ पड़े हाथ में, मुख के अर्पण होना सहज कृत्य था,&lt;br /&gt;अभी जटिलता छू न गई थी, जो कुछ था सब सरल सत्य था।&lt;br /&gt;बाल खिलौनों से क्या खेले, बना हुआ था स्वयं खिलौना,&lt;br /&gt;किलकारी से सुधा बरसती, मुस्कानों से जादू-टोना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भोलापन, हाव-भाव ये क्यों न किसी को प्यारे होते?&lt;br /&gt;उस चन्दा पर क्यों न रात-दिन राई-लोन उतारे होते?&lt;br /&gt;उसकी गतियों में विकास था, उस विकास में अच्छी गति थी,&lt;br /&gt;पैतृक अनुहारों की, शिशु के अंग-अंग में प्रिय अनुरति थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बन्धन बन गया, खिलाड़ी उस ललना को अपना पलना,&lt;br /&gt;पीठ उठा, करवट ले-लेकर, सहज कृत्य हो गया उछलना।&lt;br /&gt;भू पर सरक-सरक चलने में, उसको अद्भूत सुख मिलता था,&lt;br /&gt;चूम-चूम धरती-माता को, उसका मन-प्रसून खिलता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बालक क्या था, एक खिलौना सबने किया स्नेह-अर्पण था,&lt;br /&gt;बुआ, चाचियों और ताइयों सब ही का वह आकर्षण था।&lt;br /&gt;थी पड़ोस की महिलाओं की, बैठक वहाँ नित्य ही जमती,&lt;br /&gt;एक बार चर्चा छिड़ जाये, नहीं थामने से वह थमती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई कहती-``घर का चन्दा कितना प्यारा-प्यारा होगा,&lt;br /&gt;सभी जगह उजियाला होगा गुड्डा राज-दुलारा होगा।''&lt;br /&gt;कोई कहती-``बड़ा आदमी, बहुत बड़ा यह अफसर होगा,&lt;br /&gt;खूब कमाई करके देगा, सदा सुखी इसका घर होगा।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब महिला-मंडल जुड़ जाता, बातों का बस क्रम ही क्रम था,&lt;br /&gt;बाल-मनोविज्ञान उखड़ता, नहीं तर्क में कुछ विभ्रम था।&lt;br /&gt;किसी एक को उस दिन सूझी-आओ! इसका भाग्य परख लें,&lt;br /&gt;आगे यह क्या बनने वाला, सरल युक्ति से इसे निरख लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जटा लिये उपकरण अनेकों, खेल-खिलौने, पट्टी-पुस्तक,&lt;br /&gt;कलम-दवात, और आभूषण सोने-चाँदी के आकर्षक।&lt;br /&gt;वस्त्र रेशमी हुए उपस्थित सुन्दर चमकीले-भड़कीले,&lt;br /&gt;स्वच्छ, धवल, कुछ रंग-बिरंगे, लाल, गुलाबी नीले-पीले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि-उद्योग आदि के भी कुछ यन्त्र हुये सज्जित धरती पर,&lt;br /&gt;छोटे-मोटे अस्त्र-शस्त्र भी रखे वहाँ पर एकत्रित कर।&lt;br /&gt;निश्चिय हुआ सरक कर बालक जो भी पहली वस्तु उठाये&lt;br /&gt;तो उसके भविष्य का उसके क्रम ये अर्थ लगाया जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दूरी पर बाल-सिंह को छोड़ दिया आगे बढ़ जाने,&lt;br /&gt;रखे हुए उपकरण अनेकों, सम्मुख ही थे मन ललचाने।&lt;br /&gt;किलक गया शिशु उन्हें देखकर, लगा सरकने वह मुँह बाए,&lt;br /&gt;लगा तैरता-चलता-सा वह, हाथ बढ़ा कर शीष उठाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निकट वस्तुओं के जा पहुँचा, ऐसा उसने भरा सपाटा,&lt;br /&gt;जहाँ रखे थे अलंकरण कुछ, मारा उन पर एक झपाटा।&lt;br /&gt;बिखर गये सब इधर-उधर वे, मानो यह उनका वितरण था,&lt;br /&gt;लगा कि जैसे यह समानता से ही बँटवारे का प्रण था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर उस ओर लपक बैठा वह, एक तमंचा रखा जहाँ पर,&lt;br /&gt;एक सपाटे में ही उसको जाकर हथिया लिया किलक कर।&lt;br /&gt;अब बालक के लिये दौड़ थी, चाची ने झट लपक उठाया,&lt;br /&gt;बार-बार माथे का चुम्बन लेकर उसको हृदय लगाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोली-``राजा बेटा घर की आन-बान का रखवाला है,&lt;br /&gt;इसीलिये तो वीर-पुत्र ने हाथ तमंचे पर डाला है।''&lt;br /&gt;कोई बोल उठी,``यह काका आगे चल जण्डेल बनेगा,&lt;br /&gt;बडे-बड़ों की नाकों को यह गुड्डा विकट नकेल बनेगा।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसने जो बन पड़ा, सभी ने अपनी मति से अर्थ लगाया,&lt;br /&gt;चूम, बलैयाँ ले-ले सबने संचित स्नेहाशीष लुटाया।&lt;br /&gt;माँ प्रमुदित थी सुन-सुनकर यह, फूल, रही थी मन ही मन में,&lt;br /&gt;मना रही थी सदा सुखी हो हे प्रभु! यह अपने जीवन में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सबकी आँखों का तारा जग में अद्भूत नाम कमाये,&lt;br /&gt;इसकी उज्ज्वल कीर्ति-सूरभि से, जग का घर-आँगन भर जाये।&lt;br /&gt;भोजन के क्रम में गृहिणी ने गृह-पति को सब हाल सुनाया,&lt;br /&gt;भाग्य परखने का उपक्रम सब उनको ब्यौरे-बार बताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा किस तरह किलक-किलक कर शिशु ने निज करतब दिखलाये&lt;br /&gt;और किस तरह आभूषण सब उसने हाथों से बिखराए।&lt;br /&gt;कहा-लपक कर कैसे उसने हाथ तमंचे पर था डाला,&lt;br /&gt;कहा कि कैसे सबने उसको बतलाया घर का उजियाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर सगर्व बोली-``दिखता, यह तुम पर ही जाएगा आगे,&lt;br /&gt;यह घर में क्या आया, लगता जैसे भाग्य हमारे जागे।&lt;br /&gt;वक्ष तन गया गृह-पति का भी, मूँछों-मूँछों में मुस्काए,&lt;br /&gt;बाल-सिंह को गोदी से ले, लगे अकड़ने रौब जमाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोल उठे, ``मुझको भी दिखता,&lt;br /&gt;उज्ज्वलतम भविष्य इसका है।&lt;br /&gt;बोलो! अब तो मान गई तुम,&lt;br /&gt;आखिर यह बेटा किसका है।''&lt;br /&gt;-०००-&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13432155-6740439061110394287?l=bhagatsinghmahakavya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/feeds/6740439061110394287/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=13432155&amp;postID=6740439061110394287' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/6740439061110394287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/6740439061110394287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/2008/02/blog-post_05.html' title='बुढ़िया-पुराण या परीक्षित मनोविज्ञान'/><author><name>डा० व्योम</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://4.bp.blogspot.com/-HNGbFMXWTg0/ToqUw90EvLI/AAAAAAAAA_4/6Fw96pM3674/s220/vyom.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-13432155.post-4946774234485815021</id><published>2008-02-05T06:48:00.000-08:00</published><updated>2008-02-05T06:49:27.218-08:00</updated><title type='text'>जीवन का स्वर्ण भोर</title><content type='html'>जीवन का स्वर्ण भोर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`जन्म' नाम पाया है मैंने, जब से जन्म हुआ है मेरा,&lt;br /&gt;विविध रूप नामों से जग में लगता रहता मेरा फेरा।&lt;br /&gt;जग-जीवन के दो छोरों में, मैं जीवन का एक छोर हैं,&lt;br /&gt;दुख की काली रात नहीं हूँ, मैं जीवन का स्वर्ण-भोर हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जन-जीवन का प्रतीक हूँ, मैं उमंग की मृदु हिलोर हूँ,&lt;br /&gt;एक-दूसरे को जो, बाँधे, बन्धन की वह स्नेह-डोर हूँ।&lt;br /&gt;मैं अपने मन का राजा हूँ, नहीं समय का मैं अनुचर हूँ,&lt;br /&gt;मैं दर्पण का उज्ज्वल मुख हूँ, शुभागमन मैं चिर-सुन्दर हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जितनी है सृष्टि, सभी के जीवन का मैं पहला क्रम हूँ,&lt;br /&gt;कोई कहता निपट सत्य मैं, कोई कहता हैं मैं भ्रम हूँ।&lt;br /&gt;जो कुछ हूँ मैं, एक अजन्मा की शुभ इच्छाओं का फल हूँ,&lt;br /&gt;मैं जीवन की प्रथम रश्मि हूँ, सूनेपन की चहल-पहल हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं अपनी आँख खोलता, तोप फिर जीवन ही जीवन है,&lt;br /&gt;जल-थल-नभ मेरे घर-आँगन, मेरी गति यह जड़ चेतन है।&lt;br /&gt;जग के जन ग्रह-नक्षत्रों से मेरी गति निर्धारित करते,&lt;br /&gt;मेरे जीवन पथ के जाने कितने-कितने चित्र उतरते।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देख-देख इन गति-विधियों को, मन ही मन मैं मुस्काता हूँ,&lt;br /&gt;ज्ञात मुझे भी नहीं कौन-सा पथ जिस पर मैं बढ़ जाता हूँ।&lt;br /&gt;उत्कण्ठा के पथ चल कर, मैं जग-जीवन में आता हूँ,&lt;br /&gt;आशा के उज्ज्वल प्रकाश-सा, सब के मन पर छा जाता हूँ।&lt;br /&gt;-०००-&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13432155-4946774234485815021?l=bhagatsinghmahakavya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/feeds/4946774234485815021/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=13432155&amp;postID=4946774234485815021' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/4946774234485815021'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/13432155/posts/default/4946774234485815021'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='जीवन का स्वर्ण भोर'/><author><name>डा० व्योम</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://4.bp.blogspot.com/-HNGbFMXWTg0/ToqUw90EvLI/AAAAAAAAA_4/6Fw96pM3674/s220/vyom.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-13432155.post-2644453498130549300</id><published>2008-02-05T06:20:00.000-08:00</published><updated>2008-02-05T06:47:19.020-08:00</updated><title type='text'>शहीद भगत सिंह महाकाव्य -सर्ग (1)</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4726/1171/1600/saral-3.0.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4726/1171/1600/saral-3.0.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;सर्ग एक&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सिंह-जननी &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शान्ति के वरदान-सी, तुम धवल-वसना कौन?&lt;br /&gt;संकुचित है मौन लख कर तुम्हारा मौन।&lt;br /&gt;दूध की मुस्कान से संपृक्त ये सित केश,&lt;br /&gt;सौम्यता पर शुभ्रता ज्यों विमल परिवेश।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधुता की, सरल जीवन के लिए यह देन,&lt;br /&gt;उल्लसित मंथित अमल ज्यों ज्योत्स्ना का फेन।&lt;br /&gt;भव्यता धारण किये शुचि धवल दिव्य दुकूल,&lt;br /&gt;या खिले जीवन-लता पर ये सुयश के फूल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलुषता निर्वासिनी, यह धवलता की जीत,&lt;br /&gt;संवरित है शीष पर, यह स्नेह का नवनीत।&lt;br /&gt;प्रस्फुटित है भाल पर मानो हृदय का ओप,&lt;br /&gt;साधना पर, सिद्धि का मानो सुखद आरोप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मुख पर स्निग्ध अंतर की झलकती क्रांति&lt;br /&gt;लग रही, ज्यों साँस सुख की ले रही हो शांति।&lt;br /&gt;भावनाओं की, मुखाकृति सहज पुण्य-प्रसूति,&lt;br /&gt;झुर्रियों में युग-युगों की सन्निहित अनुभूति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देह पर चित्रित त्वचा की संकुचित हर रेख,&lt;br /&gt;लग रही वय-पत्र पर ज्यों एक सुन्दर लेख।&lt;br /&gt;या कि जीवन-भूमि पर-डण्डियों का जाल,&lt;br /&gt;चल रहा वय का पथिक संध्या समय की चाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन हो इस भाँति अपने आप मे तुम लीन?&lt;br /&gt;कौन हो तुम पुण्य-प्रतिमा-सी यहाँ आसीन?&lt;br /&gt;कौन स्नेहाशीष की तुम मूर्ति अमित उदार?&lt;br /&gt;कौन श्रद्धा-भावना ही तुम स्वयं साकार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन तुम, मन में तुम्हारे कौन-सी है व्याधि?&lt;br /&gt;अर्चना हित खींच लाई तुम्हें दिव्य समाधि।&lt;br /&gt;है कृती वह कौन, किसका समाधिस्य कृतित्व?&lt;br /&gt;वन्दना से स्वयं वन्दित, कौन वन व्यक्तित्व?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन माँ! ममता-मयी तुम? क्यों नयन में नीर?&lt;br /&gt;उच्छ्वसित उर में तुम्हारे, कौन-सी है पीर?&lt;br /&gt;पूछता हूँ मैं अकिंचन एक कवि अनजान,&lt;br /&gt;भाव-मग्ना कर रहीं तुम किस व्रती का ध्यान?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`बस करो अब वत्स! अपना सुन लिया स्तुति गान,&lt;br /&gt;अब नहीं अपराध आगे कर सकेंगे कान।&lt;br /&gt;बात हौले से करो, स्वर को सम्हाल-सम्हाल,&lt;br /&gt;सो रहा इस भूमि में बरजोर मेरा लाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो रहा है यहाँ, मेरी कोख का भूचाल,&lt;br /&gt;सो रहा इस भूमि से निज शत्रुओं का काल।&lt;br /&gt;सो रहा है मातृ-मन का यहाँ शाश्वत गर्व,&lt;br /&gt;सो रहा सुख से, मना कर वह यहाँ बलि-पर्व।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो रहा वंशानुक्रम से पुष्ट रक्तोन्माद,&lt;br /&gt;जो कि वातावरण में ढल, बन गया फौलाद।&lt;br /&gt;सो रहा है यहाँ, मेरी आग का प्रिय फूल,&lt;br /&gt;स्वर्ग का सुख दे रही, उसको धरा की धूल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूम धरती पर मचा, विद्रोह का वरदान,&lt;br /&gt;यहाँ मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।&lt;br /&gt;सो गया उल्लास मेरा, सो गया आमोद,&lt;br /&gt;एक माँ की गोद तज कर, दूसरी की गोद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओज अन्तस् का, यहाँ पर कर रहा विश्राम,&lt;br /&gt;वत्स! क्या तुमको बतादूँ उस हठी का नाम?&lt;br /&gt;लाल वह मेरा भगत, था सिंह ही साकार,&lt;br /&gt;जन्म से ही था कहाया गया वह सरदार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्जना उसकी विकट सुन, काँपते थे लाट,&lt;br /&gt;पूत चरणों की तनिक ले लूँ सुशीतल धूल।&lt;br /&gt;सुन लिया, क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?&lt;br /&gt;यहाँ मेरी भावना का सो रहा आवेश?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``तनिक ठहरो माँ! हुई वरदान मेरी भूल,&lt;br /&gt;पूत चरणों की तनिक ले लूँ सुशीतल धूल।&lt;br /&gt;इन पगों पर ही रहे युग-युग नमित यह माथ,&lt;br /&gt;फेर दो इस शीष पर माँ! स्नेह-प्रश्लथ हाथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह जननी धन्य हो तुम, कोटि बार प्रणम्य,&lt;br /&gt;धन्य निश्चय ही तुम्हारा लाल वीर अदम्य।&lt;br /&gt;किन्तु माँ! शंका तनिक मेरी अभी है शेष,&lt;br /&gt;बात हौले से करूँ, यह क्यों मिला आदेश?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``अरे! इतनी-सी न समझे तुम सरल सी बात,&lt;br /&gt;मानवी मन के कहाते पारखी निष्णात।&lt;br /&gt;सत्य है, शंका तुम्हारी है नहीं निर्मूल,&lt;br /&gt;अर्थ मेरे भाव का तुमने लिया प्रतिकूल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वार्ता के तीव्र स्वर से जागने का खेद,&lt;br /&gt;शान्ति के संकेत का मेरा नहीं यह भेद।&lt;br /&gt;वार्ता का विषय कर सकता है उसे त्रस्त,&lt;br /&gt;निज प्रशंसा-श्रवण का, वह था नहीं अभयस्त।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वत्स! दो बातें न की उसने कभी स्वीकारा,&lt;br /&gt;स्वयं का गुण-गान, या फिर शत्रु की ललकार।&lt;br /&gt;देख पाता था न मेरा लाल, आँखें लाल,&lt;br /&gt;निज प्रशंसा भी उसे करती रही बे-हाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु तुमने पूर्ण करने स्वल्प शिष्टाचार,&lt;br /&gt;था `कृती' या `व्रती' शब्दों का किया व्यवहार।&lt;br /&gt;संकुचन के क्षोभ को, उसके लिए यह बात,&lt;br /&gt;है बहुत छोटी, कदाचित् हो बड़ा व्याघात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तक है याद मुझको एक दिन की शाम,&lt;br /&gt;एक दिन आये कहीं से वे, न लूँगी नाम।&lt;br /&gt;साथ उनके आ गये थे मित्र उनके एक,&lt;br /&gt;वार्ता से ही प्रकट अति बुद्धि और विवेक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्फुटित वातावरण में हास्य और विनोद,&lt;br /&gt;पा रहे थे हम सभी, वह सरल निश्छल मोद।&lt;br /&gt;किया उपक्रम, मैं करूँ जलपान का उपचार,&lt;br /&gt;सिंह-शावक आ गया मेरे हृदय का हार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रणत होकर अतिथि का, उसने किया सम्मान,&lt;br /&gt;अतिथि की वाणी बनी वरदान का तूफान।&lt;br /&gt;``तुम प्रणत मुझको, प्रणत हो तुम्हें सब संसार,&lt;br /&gt;जियो युग-युग, तुम करो निज सुयश का विस्तार।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देख मेरी और बोले अतिथिवर सप्रयास,&lt;br /&gt;कह रहा जो बात, भाभी! तुम करो विश्वास।&lt;br /&gt;है अडिग विश्वास मन में, यह तुम्हारा लाल,&lt;br /&gt;विश्व में ऊँचा करेगा मातृ-भू का भाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मा कहती, बनेगा वीर यह सम्राट,&lt;br /&gt;इस धरा की दासता की बेड़ियों को काट।&lt;br /&gt;पूत के लक्षण प्रकट हैं पालने में आज,&lt;br /&gt;सिंहनी का सुअन होगा विश्व का सरताज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्प वय, इतनी विनय, इतना पराक्रम, ओज,&lt;br /&gt;सिंह-शावक सी ठवनि, ये नयन रक्तंभोज।&lt;br /&gt;देह सुगठित, विक्रमी चितवन समुन्नत भाल,&lt;br /&gt;शत्रुओं का शत्रु होगा यह कठोर कराल।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिथिवर की बात में व्यति-क्रम हुआ तत्काल,&lt;br /&gt;विनत होकर बाल ने स्वर में मधुरता ढाल।&lt;br /&gt;कहा-`चाचाजी! अनय यदि मैं करूँ, हो क्षम्य,&lt;br /&gt;बात मुझको लग रही अनपेक्ष और अगम्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह मुझे सम्राट, देते स्वप्न का क्यों जाल?&lt;br /&gt;स्वप्न में राजा बना सकते सदा कंगाल।&lt;br /&gt;मातृ-भू का ही अकिंचन बन सका यदि भृत्य,&lt;br /&gt;सफल समझूँगा सभी मैं साधना के कृत्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यदि गुण-गान आवश्यक, निवेदन एक,&lt;br /&gt;देश के सम्मान का, स्वर में रहें उद्रेक।&lt;br /&gt;सुन प्रशंसा, आदमी कर्तव्य जाता भूल,&lt;br /&gt;अनधिकृत श्लाघा, पतन के लिये पोषक मूल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो न करता निज प्रशंसा सुन कभी प्रतिवाद,&lt;br /&gt;अंकुरित उर में हुआ करता प्रमत्त प्रमाद।&lt;br /&gt;विकस यह अंकुर बने जब एक वृक्ष विशाल,&lt;br /&gt;पतन के परिणाम का फिर कुछ न पूछो हाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर निवेदन विज्ञवर! हो क्षम्य यह व्याघात,&lt;br /&gt;क्षम्य मेरी, आज छोटे मुँह बड़ी यह बात।&lt;br /&gt;अनवरत अपनी प्रशंसा सुन हुआ कुछ क्षोभ,&lt;br /&gt;प्रतिक्रमण का, संवरण मैं कर न पाया लोभ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``वार्ता का वत्स! अब मैं क्या करूँ विस्तार,&lt;br /&gt;वह प्रशंसा का सदा करता रहा प्रतिकार।&lt;br /&gt;शान्ति के संकेत का मेरा यही था अर्थ,&lt;br /&gt;और भी शंका रही कुछ शेष सुकवि समर्थ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``धन्य हो माँ! और क्या शंका रहेगी शेष?&lt;br /&gt;धन्य ऐसे पुत्र पाकर माँ! हमारा देश।&lt;br /&gt;धन्य हूँ मैं, आज सुन कर ये प्रबुद्ध विचार,&lt;br /&gt;है नहीं सामर्थ्य, जो अभिव्यक्त हो आभार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकर यह बात, जिज्ञासा बढ़ी कुछ और,&lt;br /&gt;किन विचारों में पला था देश का सिर-मौर?&lt;br /&gt;किस तरह विकसित हुआ मन में विकट बलिदान?&lt;br /&gt;माँ! करो उपकृत, सुना कुछ और भी प्रतिमान।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वत्स तुम कितने चतुर, कितने उदार विचार,&lt;br /&gt;स्वयं उपकृत का कथन कर, कर रहे उपकार।&lt;br /&gt;मातृ-मन का जानते हो तुम मनोविज्ञान,&lt;br /&gt;बात कर यह, कह रहे प्रमुदित मुझे मतिमान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाल मेरा, बालपन में था बहुत शैतान,&lt;br /&gt;हम नहीं केवल,पड़ौसी भी रहे हैरान।&lt;br /&gt;जब झगड़ता, साथियों के केश लेता नोंच,&lt;br /&gt;चिह्न बनते गाल पर, लेता प्रकुप्त खरोंच।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल चुनना आग के, थे प्रिय उसे ये खेल,&lt;br /&gt;घोर विपदाएँ विहँस कर लाल लेता झेल।&lt;br /&gt;तोड़ता यह, फोड़ता वह, जोड़ता कुछ और,&lt;br /&gt;थे कुएँ या बावड़ी सब खेलने के ठौर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षमा करता, यदि कभी छोटे करें अपराध,&lt;br /&gt;पर, सबल की धृष्टता का दण्ड था निर्बाध।&lt;br /&gt;चौगुना भी क्यों न हो, वह माँगता था द्वन्द्व,&lt;br /&gt;नम्र था व्यवहार में, संघर्ष में स्वच्छन्द।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्र की रक्षार्थ, वह बनता स्वयं था ढाल,&lt;br /&gt;जो उसे नीचा दिखाए, किस सखी का लाल।&lt;br /&gt;बाहुओं का जोर था उसके लिए उन्माद,&lt;br /&gt;मोम-सा तन, किन्तु बनता द्वन्द्व में फौलाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्नेह में भी, बैर में भीं, वह न था परिमेय,&lt;br /&gt;दण्ड था उद्दंडता का, साधुता का श्रेय।&lt;br /&gt;नीति दुश्मन की सही पर स्वजन की न अनीति,&lt;br /&gt;व्यक्ति पर उसकी नहीं, व्यक्तित्व पर थी प्रीति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हाँ, पूछी अभी तुमने हृदय की पीर,&lt;br /&gt;पूछते थे तुम, लिये मैं क्यों नयन में नीर।&lt;br /&gt;तो सुनो, है सहज ही सुत, व्यथा का सन्ताप,&lt;br /&gt;सुन न पाती आज मैं निज तात का संलाप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह न मेरे पास, मेरी मोद का श्रृंगार,&lt;br /&gt;आज सूना है हृदय, खोकर हृदय का हार।&lt;br /&gt;हैं तड़पते कान सुनने लाल के प्रिय बोल,&lt;br /&gt;हैं कहाँ वे चूम लूँ जो मधुर स्निध कपोल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंक में भर लूँ जिसे, वह कहाँ कोमल गात,&lt;br /&gt;वह न मेरे पास, उसकी रह गई है बात।&lt;br /&gt;मातृ-मन्दिर पर हुआ अर्र्पित सुकोमल फूल,&lt;br /&gt;शत्रुओं से जूझ, फाँसी पर गया वह झूल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांत्वना देता मुझे है लाल का सन्देश,&lt;br /&gt;``शीघ्र ही स्वाधीन होगा माँ! हमारा देश।&lt;br /&gt;तुम न समझो माँ! तुम्हारी गोद से मैं दूर,&lt;br /&gt;तुम न समझो, आज तुम पर है विधाता क्रूर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ! हमारे देश के जितने हठीले बाल,&lt;br /&gt;वे तुम्हारे ही भगत हैं, वे तुम्हारे लाल।&lt;br /&gt;देख छवि उनकी, किया करना मुझे तुम याद,&lt;br /&gt;विसर्जन मेरा, न बन जाये तुम्हें अवसाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्गं भी है जिस धरा के सामने अति रंक,&lt;br /&gt;जो सभी की माँ हमारी, ले रही वह अंक।&lt;br /&gt;व्यर्थ जायेगा नहीं माँ! एक यह बलिदान,&lt;br /&gt;है निकट स्वाधीनता का सुखद पुण्य-विहान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुक्ति की मंगल प्रभाती सुनें जिस दिन कान,&lt;br /&gt;ले नया उत्साह, खग-कुल कर उठें कल गान।&lt;br /&gt;जिस सुबह हो देश का वातावरण स्वच्छन्द,&lt;br /&gt;गा उठें कवि-कण्ठ जिस दिन गीत नव, नव-छंद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुक्ति के दिन बाल-रवि की रश्मियों का जाल,&lt;br /&gt;इस धरा पर कुंकुमी आभा अलभ्य उछाल।&lt;br /&gt;पुण्य-भारतवर्ष का जिस दिन करे अभिषेक,&lt;br /&gt;देश के नर-नाहरों की पूर्ण हो जब टेक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब उठे दीवानगी की लहर चारों ओर,&lt;br /&gt;गगन-भेदी घोष चूमे जब गगन के छोर।&lt;br /&gt;जब दिशाओं में तरंगित हो हृदय का हर्ष,&lt;br /&gt;विश्व अभिनन्दन करे-जय देश भारतवर्ष!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब मिलूंगा तुम्हें फूलों की सुरभि के संग,&lt;br /&gt;तुम्हें किरणों में मिलूंगा मैं लिये नव-रंग।&lt;br /&gt;तब पवन अठखेलियाँ कर, करे तुमको तंग,&lt;br /&gt;तब समझना, ये भगत के ही निराले ढंग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब लगेगा माँ, दुपट्टा मैं रहा हूँ खींच,&lt;br /&gt;तब लगेगा मैं तुम्हारे दृग रहा हूँ मींच।&lt;br /&gt;भास परिचित स्पर्श का जब हो पुलक के साथ,&lt;br /&gt;हाथ मेरा खींचने, अपना बढ़ा कर हाथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कहोगी-कौन हे रे ढीठ! तू है कौन?&lt;br /&gt;तब तुम्हें उत्तर मिलेगा एक केवल मौन।&lt;br /&gt;तुम चकित हो, चौंक देखोगी वहाँ सब ओर,&lt;br /&gt;सुन सकोगी हर्ष-ध्वनियाँ और जय का शोर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ही क्यों भगत, देखोगी अनेकों वीर,&lt;br /&gt;नमित नयनों से तुम्हारे चू पडेग़ा नीर।&lt;br /&gt;घुल सकेगा, धुल सकेगा रोष का उन्माद,&lt;br /&gt;गर्व से प्रतिफल करोगी माँ मुझे तुम याद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो यही सन्देश सुत का, कर रहा परितोष,&lt;br /&gt;है सराहा भाग्य मैंने, दे न विधि को दोष।&lt;br /&gt;वत्स! अन्तर का बताया है तुम्हें सब हाल,&lt;br /&gt;तुम बताओ, क्यों बने जिज्ञासु तुम इस काल?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``लग रहा माँ! मुझे जैसे आज जीवन धन्य,&lt;br /&gt;आज मुझ-सा भाग्य-शाली कौन होगा अन्य?&lt;br /&gt;कर न पाया तप कि पहले मिल गया वरदान,&lt;br /&gt;पूर्ण होता दिख रहा अपना बड़ा अरमान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावनाओं ने हृदय से है किया अनुबन्ध,&lt;br /&gt;क्रान्ति के इस देवता पर लिखूँ छन्द प्रबन्ध।&lt;br /&gt;आ गया इस ओर लेने प्रेरणा मैं आज,&lt;br /&gt;माँ! तुम्हारे लाल की जैसे सुनी अवाज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगा जैसे कह रहा हो सिंह आज दहाड़,&lt;br /&gt;लेखनी से कवि निराशा का कुहासा फाड़।&lt;br /&gt;तुम सुकवि हो, मिला वाणी का तुम्हें वरदान,&lt;br /&gt;तुम जगा दो निज स्वरों से देश में बलिदान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखनी की नोंक में भर दो हृदय की शक्ति,&lt;br /&gt;और कह दो धर्म केवल है धरा की भक्ति।&lt;br /&gt;देश की मिट्टी इधर, उस ओर सौ साम्राज्य,&lt;br /&gt;ग्रहण मिट्टी को करो, साम्राज्य हों सौ त्याज्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीष पर धर देश की मिट्टी, करो प्रण आज,&lt;br /&gt;प्राण देकर भी रखेंगे, हम धरा की लाज।&lt;br /&gt;सह न पायेंगे कभी हम, देश का अपमान,&lt;br /&gt;देश का सम्मान है प्रत्येक का सम्मान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो उठाये इस हमारी मातृ-भू पर आँख,&lt;br /&gt;रोष की ज्वाला भने, हर फूल की हर पाँख।&lt;br /&gt;भूल कर भी जो छुए इस देश का सम्मान,&lt;br /&gt;कड़कती बिजली बने हर कली की मुस्कान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्य इस आदर्श का, सब को बता दो आज,&lt;br /&gt;सो रहे जो, कवि! जगा दो दे उन्हें आवाज।&lt;br /&gt;आज कवि की लेखनी उगले कुटिल अंगार,&lt;br /&gt;साधना का, रक्त की लाली करे श्रृंगार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्जना का घोष हो, हर शब्द की झंकार,&lt;br /&gt;रोष की हुँकार हो गाण्डीव की टंकार।&lt;br /&gt;शान्ति का सरगम बने संघर्ष का उत्कर्ष,&lt;br /&gt;आज भारतवर्ष का हर वीर हो दुर्द्धर्ष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि! भरो पाषाण में भी आज पागल प्राण,&lt;br /&gt;चाहता युग कवि-स्वरों का आज सत्य प्रमाण।&lt;br /&gt;कर सके यह, लेखनी का तो सफल अस्तित्व,&lt;br /&gt;सफल, वाणी का मिला जो आज तुमको स्वत्व।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``माँ! इसी सन्देश की उर ने सुनी आवाज,&lt;br /&gt;खींच लाई है यही आवाज मुझको आज।&lt;br /&gt;क्रांति के जो देवता, मेरे लिये आराध्य,&lt;br /&gt;काव्य साधन मात्र, उनकी वन्दना है साध्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यह सौभाग्य मेरा, जो यहाँ तुम प्राप्त,&lt;br /&gt;क्या न शुभ संकल्प का संकेत यह पर्याप्त?&lt;br /&gt;तुम करो माँ! आज मुझ पर और भी उपकार,&lt;br /&gt;सिंह-सुत की वार्ता कह, आज सह-विस्तार।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``वत्स! तुमने विवश मुझको कर दिया है आज,&lt;br /&gt;रह न पायेगा हृदय में आज कोई राज।&lt;br /&gt;पर समय का भी हमें रखना पड़ेगा ध्यान,&lt;br /&gt;क्यों न घर चल हम विचारों का करें प्रतिपादन?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दे सकूँगी क्या तुम्हें आतिथ्य का आह्लाद?&lt;br /&gt;और रूखी रोटियों में क्या मिलेगा स्वाद?&lt;br /&gt;किन्तु तुमको पास बैठा, स्नेह का ले रंग,&lt;br /&gt;लाल के चित्रित करूँगी, मैं अनेक प्रसंग।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``माँ! तुम्हारा मान्य है साभार यह प्रस्ताव,&lt;br /&gt;रोटियाँ रूखी भले, रूखा न होगा भाव।&lt;br /&gt;वस्तु में क्या, भावना में ही निहित आनन्द,&lt;br /&gt;काव्य शोभित भाव से, हो भले कोई छन्द।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो चलो माँ! आज मुझको दो दिशा का दान,&lt;br /&gt;आज मेरी भावनाओं को करो गतिवान।&lt;br /&gt;मुक्त स्नेहाशीष का खोलो अमित भण्डार,&lt;br /&gt;विश्व-जीवन को बने आलोक, माँ का प्यार।''&lt;br /&gt;-०००- &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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